सर्वे भवन्तु सुखिन:
सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चित् दु:खभाग भवेत् ।।
सभी सुखी होवें,
सभी रोगमुक्त रहें,
सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें,
किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े
iii - तप: , Spiritual discipline; (Tapa)
अपने सद् उद्देश्य की सिध्दि में जो भी कष्ट बाधाएँ, प्रतिकूलताएँ आएँ,
उनको सहजता से स्वीकार करते हुए,
निरन्तर, बिना विचलित हुए, अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना तप कहलाता है।

बौध्दिक तप - काम-क्रोधादि विकार, लोभ-मोह-निन्दा-राग-द्वेष-भ्रान्ति कुवृत्तियों का सदा निवारण करते रहना।
अपमान, हानि, निन्दा से भी बुध्दि का सन्तुलन न खोना,
इन्द्रियों और मन का दमन करते रहना, आदि बुध्दि का तप है।

जन्मैव व्यर्थतां नीतं भवभोग प्रलोभिना ।
काच मूल्येन विक्रीतो हन्त चिन्तामणिर्मया ।। ३९१/२०५

प्राप्त हुआ यह मानव-जन्म, संसार के भोगों के प्रलोभन में फंस जाने से व्यर्थ ही गया;
चिन्तामणि-रत्न के समान मानव-जीवन को देकर काँच के समान हीन विषयों को लिया, यह कैसी विडम्बना है ।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन: ।
काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत् ।।

अर्थात् - काम, क्रोध, लोभ मानव के पतन के महाकारण होने से त्याग देने योग्य हैं। इस आदेश के अनुसार बुद्धि को सदा इन से दूर रखें; क्योंकि तृष्णा में बँधी बुद्धि भोग-ऐश्वर्य में फँसकर मन-इन्द्रिय तथा देह को भी दास बना देती है ।

यतो यतो निश्चरित मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ।। ( गीता ६-२६)

अर्थात् - यह चपल-अस्थिर मन जिस-जिस इन्द्रिय और विषय को और भागे, उधर से रोककर इसे बुद्धि के वश में करें - बे लगाम घोड़े के समान बने मन को बुद्धि के द्वारा वश में करना ही बोद्धिक-तप है ।

वाचिक तप - क्रोध, आवेश में आकर अपमानजनक वचनों का व्यवहार न करना।
विवाद न करना। प्रत्येक प्रकार के पाप से, जो वाणी के द्वारा होते व हो सकते हैं, उन्हें न करना वाणी का तप है ।

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियं हितञ्च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ् मयं तप उच्यते ।। ( गीता १७-१५)

अर्थात् - जो वचन किसी की बुद्धि में क्षोभ, क्रोध, द्वेष, अपकार, प्रतिकार आदि को उत्पन्न न करे ऐसे सत्य, प्रिय, मधुर वचन बोलना, जिससे दूसता व्यक्ति आवेश को त्यागकर नम्र, प्रसन्न हो जाये । मौन रहना भी महा तप है ।

मूक: पर अपवादे पर-दार निरीक्षणेऽप्यन्ध: ।
पङगु पर-धन हरणे स जयति लोकत्रये पुरष ।।

अर्थात् - जो व्यक्ति पर-अपवाद - दूसरे की निन्दा-सतुति में चुप रहता है । नारी दर्शन में अन्धा बना रहता है, पर-धन हरण के लिए मानो लँगडा है, उस पुरुष ने मानो संसार को जीत लिया है। इस भाँति वाणी का तप-संयम करके अमोघ-शक्ति का सञ्चय करें ।

शरीरिक-तप - भूख, प्यास, शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वों को सहन करना, शुद्धि और सरलता रखना, ब्रह्मचर्य और अहिंसा का पालन करना शारीरिक-तप कहलाता है ।
इन सुखों के देने में सहायक योगी, सिद्ध, गुरुजन तथा अन्य ऊँची स्थिति या साधारण स्थिति के व्यक्तियों की यथायोग्य़ सेवा करना चाहिए ।

असम्माने तपो वृद्धि: सम्मानाच्च तप: क्षय ।
पूज्या पुण्यहानि: स्यान्निन्दया सदगतिर्भवेत् ।।

अर्थात्- अपमान से तप में वृद्धि होती है, और मान, प्रतिष्ठा, यश से तप में विध्न पड़ता है; योगी की निन्दा होने से योगी को अपने दोष दूर करने और सदगुणों का संग्रह करने में बड़ी सहायता मिलती है।

अपनी पत्नी, भोजन, धन में सदा सन्तोष रखना चाहिए, परन्तु दान देने में पठन-पाठन में कभी सन्तोष न करें । माता, पिता, आचार्य इन तीनों का सदा प्रिय करें, सेवा सत्कार करें । इन तीनों की सेवा और सन्तुष्टि में सब तप पूर्ण हो जाते हैं

जो तपस्वी नहीं है उसे योग-सिध्दि नहीं हो सकती। क्योंकि अनादि काल से कर्म वासनाओं के जाल में बँधा तथा पाँच क्लेशो से चित्रित हुआ चित बिना तप के शुध्द नहीं हो सकता। इस वासना जाल का सम्भेदन करने में तप ही समर्थ है।