सर्वे भवन्तु सुखिन:
सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चित् दु:खभाग भवेत् ।।
सभी सुखी होवें,
सभी रोगमुक्त रहें,
सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें,
किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े
ii - सन्तोष; (Santosha)
- प्राप्त धन से अधिक की लालसा न करना; कम होने पर शोक न करना।

बौध्दिक सन्तोष - धन- ऐश्वर्यादि भोग-सामग्री की लालसा में किसी प्रकार का 'गिला' व रोष बुध्दि में न उपजे; और ऐश्वर्य होने पर हर्षत न होकर; आवश्यकता से अधिक को त्याग देने का विचार रहे - यह बौध्दिक सन्तोष है। जब विचारपूर्वक अपने भाग्य पर विश्वास दृढ़ होगा, तभी तो किसी का धन ग्रहण न करने का विचार तथा आचरण भी होगा। सन्तोषरूपी अमृत से तृप्त शान्तचेता महापुरुषों को सुख मिलता है, वह धन-ऐश्वर्य के लोभी इधर-उधर भागने वालों को प्राप्त नहीं होता।

न योजनशतं दूरं बाध्यमानस्य तृष्णया,
सन्तुष्तस्य कर प्राप्तेप्यर्थे भवति नादर:। ( सुभाषित २०-१०)

अर्थात् - तृष्णा के दास बने मनुष्य के लिए सैकड़ों मीलों की दूरी भी दूरी नही है। वह देश-विदेश में अर्थकामना पूर्ति के लिए मारा-मारा फिरता है; परन्तु सन्तुष्ट योगी समीप आयी लक्ष्मी को भी ठुकरा देता है।

आचार्य यम ने प्रसिध्द बालक नचिकेता की परीक्षा करते हुए आत्मजिज्ञासा के बदले में जब अतुल भोग-सामग्री देने को कहा तो उस परमसन्तोषी विरक्त-बुध्दि का दिया उत्तर पुन:-पुन: दोहराने योग्य है-
वोभावामत्र्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्तितेज:,
अपि सर्वजीवितमल्पमेव तवैववाहास्तव नृत्यगीते।
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्योलप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्मचेत्त्वा,
जीविष्यामो यावदीशिष्यसित्वं, वरस्तु मे वरणीय स एव। ( कठ॰ २६-२७)


हे आचार्य! यम, उत्पन्न हुए मनुष्य तथा सब ऐश्वर्यादि पदार्थ नाशवान हैं, आज नहीं तो कल नष्ट हो जायेंगे तथा इन्द्रियों के तेज को भी भस्म कर जायेंगे; कितना ही लम्बा हो - जीवन क अन्त भी होना ही है, उस के पीछे ये सब ऐश्वर्य यहीं पड़े रहेंगे। ऐश्वर्य से मनुष्य तृप्त हो गया हो, ऐसा सम्भव नहीं है। मनुष्य भी अपनी आयु से अधिक जीवित नहीं रह सकता। अत: हे आचार्य! मुझे आत्म ज्ञान का ही वरदान दीजिए ।

जिस महापुरुष की बुध्दि विवेक से तृप्त तथा सन्तुष्ट हो गयी है, उसे सर्वत्र सम्पदा-ही सम्पदा मिलती है।
आशा के दास बने व्यक्ति संसार के ही दास बन जाते हैं। जिन्होने आशा को दासी बना लिया है, यह संसार उनका दास बन जाता है। अत: लोभ, मोह, राग, आशा, तृष्णादि के वशीभूत न होकर सदा सन्तोष का आश्रय ग्रहण करें।

वाचिक-सन्तोष - वाचालता को त्याग देना वाचिक - सन्तोष है।
कटुवचन सुनकर, अपमानित होकर, हानि उठाकर भी क्रोधादि से आवेश में न आकर दुर्वचनों का त्याग, निवृत्ति का उपदेश, स्वल्प भाषण, विवाद का त्याग, गुरुजनों से प्रताड़ित होकर भी प्रत्युत्तर न देना तथा यथाशक्ति मौन रहना आदि वाचिक-सन्तोष कहा जाता है। वाणी के द्वारा होने वाले सभी दुर्व्यवहारों का परित्याग कर देने से वाचिक-सन्तोष की प्रात्पि होती है।

शारीरिक सन्तोष - शरीर से हिंसा, चोरी, व्यभिचार, विषयों का उपभोग, किसी का अपकार, बलात्कार, अत्याचार आदि दुष्कर्म करना तथा काम-क्रोधाधि विकारों से प्रभावित होकर कुकर्म न करना एंव दीन-दुखियों की सेवा, ब्रह्मचर्य का पालन, सत्कर्मो का अनुष्ठान करना शारीरिक सन्तोष है।

यह आशा मनुष्य का भक्षण करने वाली राक्षसी अथवा विष की बेल के समान है। इसलिए सर्व प्रकार से आशा-तृष्णा को त्यागकर परम सन्तोष धारण करने वाले की सर्वत्र पूजा होती है।