सर्वे भवन्तु सुखिन:
सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चित् दु:खभाग भवेत् ।।
सभी सुखी होवें,
सभी रोगमुक्त रहें,
सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें,
किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े
i - शौच; ( Shaucha )

शौच कहते है शुध्दि, पवित्रता को साधक को रोज जल से शरीर की शुध्दि, सत्य कर्मों से मन की शुध्दि, विधा और तप के द्वारा आत्मा की शुध्दि तथा ज्ञान के द्वारा बुध्दि की शुध्दि करनी चाहिए।

बौध्दिक शौच - काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्षा, द्वेष, त्रष्णा, अभिमान, कुविचार का त्याग करना।
दया, नम्रता, गायत्री जाप, अहिंसा, सत्यादि की धारणा, वेदशास्त्र के स्वाध्याय के द्वारा निरन्तर सत्त्वगुणा के प्रवाहिर रहने से बुद्धि की शुद्धि होती है ।

वाचिक शौच - कठोर, निन्दा, छल का त्याग करना । सत्य, मधुर भाषण, स्नेह, एव प्राणायाम से वाक-शुद्धि होती है ।
पान की जड़, कड़वे बदामों का सेवन ( डाक्टर की सलाह से ) करने से जीभ के दोष दूर हो जाते हैं, कण्ठ-स्वर मधुर हो जाता है।

शारीरिक शौच - जल आदि के द्वारा धोने से त्वचा एवं अंग्गों की शुद्धि होती है ।, जलनेति इत्यादि कर्मों से देह की आन्तरिक शुद्धि होती है । सात्त्विक, शुद्ध कमाई का अन्न, जो नियमित-परिमित रूप में लिया जाये तथा भद्र आचरण, जिसमें हिंसा, चोरी, व्यभिचार, मांस, मदिरा का परित्याग रहता है, इससे शरीर निरोग रहकर शुद्ध रहता है ।

सत्त्वशुध्दि सौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शन योग्यत्वानि च। २-४१

अर्थात् - मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा के अभ्यास से चित्त शुध्द होकर सौम्य-शान्त बन जाता है। चित्त, बुध्दि, मन में एकाग्रता बढ़ने लगती है, इन्द्रियों पर विजय प्राप्त हो जाती है। आत्मदर्शन की योग्यता आ जाती है - और ब्रह्मदर्शन का अधिकार मिल जाता है।