सर्वे भवन्तु सुखिन:
सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चित् दु:खभाग भवेत् ।।
सभी सुखी होवें,
सभी रोगमुक्त रहें,
सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें,
किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े
v. अपरिग्रह ;
अपरिग्रह:-अपनी निजी आवश्यकता स्वयं निर्धारित करके उतनी ही भोग-सामग्री ग्रहण करें। धन के कमाने में सदा महान् कष्ट उठाना पड़ता है, नाना प्रकार की विपत्तियाँ झेलनी पड़ती है। सो जो कुछ भी धन, भूमि, भवन हमें प्राप्त हों उसी में सन्तुष्ट हो कर जीवन के मुख्य लक्ष्य ईश्र्वर-आराधना करना अपरिग्रह है।