सर्वे भवन्तु सुखिन:
सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चित् दु:खभाग भवेत् ।।
सभी सुखी होवें,
सभी रोगमुक्त रहें,
सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें,
किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े
iv. ब्रह्मचर्य ;
ब्रह्मचर्य का अर्थ है, ऐसा आचरण करना जिससे भगवान् की समीपता अधिक से अधिक प्राप्त रहे।

ब्रह्मचर्य गुप्तेन्द्रियस्योपस्थस्य संयम:
अर्थात् गुप्तेन्द्रिय-मूत्रेन्द्रिय का संयम रखना ब्रह्मचर्य है। कामवासना को उत्तेजित करनेवाला कर्म, दर्शन, स्पर्शन, एकान्तसेवन, भाषण, विषय का ध्यान-कथा आदि कर्मों से बच कर ब्रह्मचारी को सदा जितेन्द्रिय होना चाहिए।

अभिवादन शीलस्य नित्यं वृध्दोपसेविन:;
चत्वारि तस्य वर्ध्दन्ते आयुर्विधा यशोबलम् ।
मनु २-१२१
अर्थात् - प्रात:काल जागने और रात्रि को सोने से पूर्व आचार्य आदि वृध्द-पूज्यजनों को प्रणाम किया करें, वृध्दजनों के आशीर्वाद से व्रती के आयु, विध्या, यश, बल की वृध्दि होती है।

गृहस्थ-जीवन
सर्वेषामपि चैतेषां वेद स्मृति विधानत:
गृहस्थ उच्यते श्रेष्ठ: सं त्रीनेतान् विभर्ति हि।
यथा नदी नदा: सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् ।
( अ॰ ६ श्लोक ८९-९०)
अर्थात् - जैसे छोटी नदियाँ और बड़े नद सभी सागर में आश्रय पाते हैं, इसी भाँति ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, संन्यासी, आदि गृहस्थी से ही भोजन-वस्त्रादि पाकर जीवन-यापन करते हैं। इस कारण गृहस्थाश्रम को वेद-स्मृति आदि श्रेष्ठ मानते हैं। इससे स्पष्ट हो रहा है कि यह गृहस्थाश्रम किसी अन्य आश्रम से हीन नहीं वरन् श्रेष्ठ है।

गर्भाधान हो जाने के पीछे उन्हें सर्वथा ब्रहाचर्य का कठोरता से तब तक पालन करना चाहिए, जब तक कि बालक माता का दूध पीता रहे। इससे विपरीत आचरण करने से जहाँ अपने शरीर की क्षति होगी, वहाँ इस दुराचार के कारण सन्तति भी दुर्बलेन्द्रिय, कामादि दुर्गुणों से युक्त उत्पन्न होगी। क्योंकि काम, क्रोधादि के समय देह का एक-एक कण इनसे व्याप्त हो जाता है। ऐसी अवस्था में कामातुर दम्पतियों के सम्मिलन से गर्भस्थ बालक के रक्त का एक-एक कण काम से भरा हुआ होगा।

शुक्र ही देह का राजा है, इसलिए सभी महापुरुषों ने मुख्य रूप से शारीरिक ब्रह्मचर्य पर आत्यधिक बल दिया है।

शुक्र सौम्य सितं स्निग्धं बल पुष्टिकरं स्मृतम्
गर्भबीजं वपुसारो जीवस्याश्रय उत्तम:।१
ओजस्तु तेजो धातूनां शुक्रान्तानां परं स्मृतम् ,
हदयस्थमपि देह स्थिति निबन्धनम् ।२

अर्थात् - यह शुक्र पवित्र, शीतल, चिकना, बलपुष्टिदायक है, इस बीज से बालक-बालिका उत्पन्न होते हैं; जीवन का सार और जीवन का मुख्याश्रय व ज्योति है। देह को स्थिर रखने वाले रस, रक्त, मांस, मज्जा आदि सात धातुओं का सार शुक्र है और शुक्र तेज एवं ओज है। यह समस्त देहव्यापी पदार्थ देह की स्थिति का स्थापक है, अत: इस अमूल्य निधि की सर्व प्रकार रक्षा करनी चाहिए।

न जात काम: कामनामुपभोगेन शाम्यति,
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्ध्दते।
( मनु॰ २-९४)
अर्थात् - संसार के भोगों से मनुष्य की तृप्ति नहीं होती, ज्यों-ज्यों भोग भोगता है, तृष्णा अधिक बढ़ती है, जैसे कि अग्नि में धृत डालने से ज्वाला अधिक प्रचण्ड होती है। सो, जो केवल सन्तति के लिए स्त्री से सहवास करते हैं, और गर्भाधान हो जाने पर ब्रह्मचारी रहते हैं; एवं जो पालन-पोषण, शिक्षण कर सकने योग्य दो-चार सन्तानें हो जाने पर फिर ब्रह्मचारी ही रहते हैं, वे देव-तुल्य हैं, उनकी सन्तति भी देवतुल्य तथा आदरणीय होती हैं।

कर्मेन्द्रियों में गुप्तेन्द्रिय सबसे बलवान् है, इस पर विजय पाना अति कठिन है। इसी कारण 'गुप्तेन्द्रिय-संयम' को ब्रह्मचर्यव्रत पालन करने में मुख्यता दी गयी है। बौध्दिक ब्रह्मचर्य - किसी प्रकार से रति-भावना बुध्दि में उत्पन्न न होने देना बुध्दि द्वारा ब्रह्मचर्य पालन करना है, गीता का कथन है-

विषयान् ध्यायतो पुंस: सगं स्तेषूपजायते,
संगात् सज्जायते काम: कामात् क्रोधो।़भिजायते।

अर्थात् - विषयों का विचार करने से उन विषयों के संग की इच्छा-पूर्ति की कामना उपजती है, और उस संग से काम की इच्छा जाग्रत होती है। इससे स्पष्ट है कि ऐसा साहित्य न पढ़ें, ऐसा दृश्य न देखें, ऐसी बात न सुनें - करे जो कामवर्ध्दक एवं उत्तेजक हो। काम का मुख्य रूप में सम्बन्ध स्त्री से माना जाता है।

स्मरणं कीर्तनं केलि: प्रेक्षणं गुप्तभाषणम्‌,
सङल्पाध्यवसायश्च क्रियानिर्वृत्तिरेव च।
एतन्मैथुनमष्टाङं प्रवदन्ति मनीषिण:,
विपरीतं ब्रह्मचर्यमेतदेवाष्टलक्षणम्‌। २
, सुश्रुत
अर्थात्‌ - नारी का स्मरण, स्त्रियों की चर्चा करना, उनके साथ खेलना-कूदना, यौवन और सौन्दर्य से आकृष्ट होकर बार-बार देखना, एकान्त में बातें करना, भोग-विलास की बातें सोचना तथा करना, फिर नारी की प्राप्ति की कामना करना यहा अब्रह्मचर्य है तथा इनका पूर्णतया त्याग ही ब्रह्मचर्य है।

वाचिक-ब्रह्मचर्य-इसमें विशेष रूप से वाणी का संयम ही किया जाता है। कुछ भी अश्लील न कहना।

शारीरिक ब्रह्मचर्य - स्त्रियों का स्पर्श, पर-नारियों के साथ घुल-मिलकर बैठना, यात्रा करना, आना-जाना आदि शारीरिक कर्म ब्रह्मचर्य के नाशक हैं। - नारियों के साथ नाचना, चूमना आदि आर्य-संस्कृति के विपरीत आचरण है। इस प्रकार हमने देखा कि काम-रोग की चिकित्सा जब नारी के द्वारा की जाती है, तभी कष्टप्रद संसार के विस्तार में फँसकर मनुष्य जन्म-मरण के कष्ट-चक्र में फँसा रहता है।