सर्वे भवन्तु सुखिन:
सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चित् दु:खभाग भवेत् ।।
सभी सुखी होवें,
सभी रोगमुक्त रहें,
सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें,
किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े
v - Offering of one's life to God; (ईश्वर-प्रणिधान)
ईश्वर-प्रणिधान - नियम का यह अन्तिम पाँचवाँ अंग है
ईश्वर प्रणिधानं सर्वक्रियाणां
परमगुरावर्पणन्तफल संन्यासोवा ( योग २-१ )

जितने भी कर्म बुद्धि, वाणी, और शरीर से किये जाते हैं, और छोटी से छोटी क्रियामात्र को परम गुरु भगवान् अथवा ईश्वर के अर्पण करते जाना तथा उन कर्मों के फलों भी भगवान के अर्पण कर देना ।
पहले जितने आचार्य हुए, वे सब काल का ग्रास बन चुके; शरीर-त्याग चुके;
काल से जिस का नाश नही होता, ऐसा नित्य-अविनाशी ईश उन गुरुजनों का भी गुरु होने से परमगुरु है।
उस परमगुरु ईश्वर को ही शुभाशुभ सब प्रकार के कर्मों को उनके फल सहित समर्पित कर देना, निष्काम भाव से कर्म करते रहना, यह भाव ईश्वर-प्रणिधान से व्यक्त होता है ।

बुद्धि के द्वारा मन, इन्द्रियों पर पूर्ण अधिकार रखकर इसे बेलगाम घोडे के समान विषयों की ओर दौडने न देना;
मन के व्यापार द्वारा बुद्धि में चपलता-विकल्प न होने देकर इसे चित्त में विलीन करना। बौद्धिक-ईश्वर प्रणिधान है ।

वाणी के द्वारा भगवान के गुणों का वर्णन करना, स्तुति-प्रार्थना, मन्त्रों का जाप, पुजा पाठ अादि करना ।