सर्वे भवन्तु सुखिन:
सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चित् दु:खभाग भवेत् ।।
सभी सुखी होवें,
सभी रोगमुक्त रहें,
सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें,
किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े
i. सिद्धासन -
1.) सर्वप्रथम पाँवो को सामने रखकर साधारण स्थिति में बैठें ।
2. ) दायें पैर को घुटने से मोड़कर, एड़ी को गुदा और उपसथेन्द्रिय के बीच सीवन स्थान में इस प्रकार से जमा लें कि पैर का तलवा जाँघ का स्पर्श करे।

3.) फिर बायें पैर को भी घुटने से मोड़ कर एड़ी जननेन्द्रिय के मूल पर रखकर मेरुदण्ड को सीधा करके बैठें, जिससे कटि, ग्रीवा और मस्तक एक सीध में हो जाये ।

4.) इस के बाद दोनों हाथों को 'ज्ञान-मुद्रा' लगाकर जानुओं पर रखें । दोनों घुटने भुमि पर सटे रहें ।

5.) उसके पश्चात् नेत्र-दृष्टि अपनी सुविधा के अनुसार भ्रु-मध्य में य नासिका के अग्रभाव पर स्थिर करके और निश्चेष्ट होकर बैठ जायें ।
लाभ - यथा नाम तथा गुण के अनुसार इसका सिद्धासन नाम रखा गया है । इसी असन में बैठ कर योगीजन योग-सिद्धि प्राप्त करते हैं ।

इस आसन को लगा कर ध्यान में बैठने से मुलाधार चक्र में शीघ्र क्रीया प्रतिक्रिया होने लगती है: - जैसे सुषुम्ना का मार्ग खुलने लगना, प्राण तथा शुक्र का ऊर्ध्व गमन करना, इन्द्रियाँ निश्चल तथा मन की स्थिरता आदि साधक को प्रत्यक्ष अनुभव के रूप में आने लगता है ।

उपस्थमूल में स्थित शुक्र वाहिनी नाड़ी के एड़ी द्वारा निरन्तर दबते रहने से उत्पन्न हुई शिथिलता के कारण ब्रह्मचर्य-पालन में सहायता मिलती है । द्वन्द्व सहन की योग्यता आने लगती है ।