सर्वे भवन्तु सुखिन:
सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चित् दु:खभाग भवेत् ।।
सभी सुखी होवें,
सभी रोगमुक्त रहें,
सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें,
किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े
ii सत्य;
मन-वचन-कर्म में जो समान रहे; जैसा देखा और अनुमान करके बुध्दि से निर्णय किया अथवा सुना हो, वैसा ही वाणी से कथन कर देना और बुध्दि में धारण करना। अत: सब प्रकार से परीक्षा करके सर्वभूत हितकारी वचन बोलना ही सत्य है।

बौध्दिक सत्य: जब तक सब प्रकार से निश्चय करके बुध्दि किसी बात को स्वीकार नहीं कर लेती, तब तक बोलना तथा व्यवहार करना कई बार असम्भव हो जाता है। वाद-प्रतिवाद आदि में सन्तुलन करके निर्णय कर लेना ही बौध्दिक सत्य है।  इसलिए योगी हो या भोगी, जो भी सत्यासत्य का निर्णय करके वचन बोलेगा, उसी अनुसार कर्म करेगा, वह सफल होगा, यशस्वी तथा श्रध्देय बनेगा।

सत्यप्रतिष्ठायां क्रिया फलाश्रयत्वम् । ( योग २-३६)

यह सूत्र स्पष्ट कह रहा है कि सत्यनिष्ठ व्यक्यि का वचन सदा फलीभूत होता है।

वाचिक-सत्य - बौध्दिक सत्य की प्रतिष्ठा हो जाने पर ही निर्भयता से सत्य भाषण भी हो सकता है। अन्यथा लोभ, क्रोध, मोह, राग, द्वेष, भय के वशीभूत होकर मनुष्य मिथ्या-भाषण तथा मिथ्या-आचरण करते देखे और सुने जाते हैं। अत: सत्य भाषण के व्रती को यह बात सदा स्मरण रखनी चाहिए कि वह सत्य, मित एंव हितभाषी हो। 

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् मा ब्रूयात् सत्यमप्रियम् । प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्म: सनातन:।

अर्थात् - सत्य बोलें, परन्तु प्रिय शब्दों में बोलें, परन्तु प्रिय लगने के लिए असत्य भाषण न करें, ऐसा पुरातन विधान है। जैसे नेत्रहीन को अन्धा कह देना सत्य है, चोर को चोर कह देना भी सत्य है- किन्तु यह अप्रिय सत्य है, इसीलिए नेत्रहीन को सूरदास, प्रज्ञाचक्षु आदि शिष्ट शब्दों से सम्बोधित किया जाता है । 

मित्रद्रोही कृतध्नश्च तथा विश्वासधातका:, त्रयसते नरकं यान्ति यावच्चन्द्रदिवाकरौ।

अर्थात् - मित्र से द्रोह करनेवाला, कृत उपकार को न मानने वाला, विश्वास दिलाकर उससे मुकर जानेवाला, ये तीनों प्रकार के व्यक्ति जब तक चन्द्र-सूर्य उदय-अस्त होते रहेंगे, सदा नारकीय कष्ट पाते रहेंगे।

शारीरिक सत्य
- शारीरिक सत्य का अभिप्राय है, विचार में तथा भाषण में अाये सत्य का कर्म द्वारा आचरण करना। बुध्दि, वचन, कर्म इन तीनों में समान रूप से बना रहनेवाला 'सत्य' कहा जाता है।

'महाजनो येन गत: स पन्था' अर्थात् जैसा आचरण महान् पुरुष करते आये हैं - कर रहे हैं वही आचरण श्रेष्ठ है, करने योग्य है, वही कर्तव्य तथा धर्म है।